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Self-portrait

साइमन बेनिंग (1483-1561): फ्लेमिश लघु चित्रकार और इलुमिनेटर। परिदृश्य, बुक ऑफ आवर्स और चित्रों के लिए प्रसिद्ध। नीदरलैंड की कला के एक प्रमुख व्यक्तित्व।

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विश्वव्यापी डिलीवरी (), मानक 4/5 सप्ताह के बजाय मात्र 2 सप्ताह में। (22 जुलाई)

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Self-portrait

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प्रतिकृति का आकार

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कुल देय राशि

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संग्रहणीय वस्तु का विवरण

Written in gold on a red background is an inscription that identifies this miniature as a self-portrait of the famous Bruges illuminator, Simon Bening: "Simon Bennik, the son of Alexander, painted this himself at the age of 75 in 1558."Simon Bening became one of the most famous illuminators of the sixteenth century. He spent his early years in Ghent or Antwerp, probably working under the tutelage of his father, the illuminator Alexander Bening. Simon moved to Bruges permanently in 1517, where over time he headed a large and flourishing workshop. Although Bening was much admired in his day and widely imitated, his artistic personality has yet to be thoroughly studied.This miniature painting has attracted considerable interest in art history as an early self-portrait of an artist. Bening portrays himself, spectacles in hand, seated before a wooden easel. The easel holds a drawing of the Virgin and Child; along its left edge, small ledges hold various painting materials. In representing this imagery Bening allies himself with Saint Luke, the patron saint of painting, who is traditionally shown painting an image of the Virgin - a subject that itself became a conceit for the self-portrait of the artist in the 15th and 16th centuries. Bening portrays himself not in the garb of an artisan, but as a member of the intelligentsia. By inscribing his work with a signature (as the son of Alexander) and a date, he acknowledges his talents and heritage in the distinguished lineage of Bening illuminators in Bruges. The illumination was probably made as an independent work, rather than as part of a book, at a time when autonomous miniatures increasingly came into production. A second version of this miniature is in the Victoria and Albert Museum, London.

कलाकार का जीवन परिचय

राफेल: सौंदर्य के कवि

इटली के उर्बिनो में 6 अप्रैल, 1483 को जन्मे राफेल सानज़ियो, जिन्हें राफेल के नाम से जाना जाता है, एक ऐसे चित्रकार और वास्तुकार थे जिनका नाम 'हाई पुनर्जागरण' (High Renaissance) की भव्यता और सामंजस्य का पर्याय बन गया है। यद्यपि उनका जीवन केवल सैंतीस वर्षों तक ही रहा – 6 अप्रैल, 1520 को उनकी असामयिक मृत्यु हो गई – लेकिन पश्चिमी कला पर राफेल का प्रभाव अतुलनीय है। वे केवल एक कुशल शिल्पकार नहीं थे; उनके भीतर एक जन्मजात काव्य संवेदनशीलता थी, जो मानवतावाद और नव-प्लेटोनिक दर्शन के आदर्शों को लुभावनी सुंदर पेंटिंग्स में बदलने की क्षमता रखती थी, जो सदियों बाद भी दर्शकों को मंत्रमुंगी कर देती हैं। उनकी विरासत मुख्य रूप से उनकी "मैडोना" (Madonnas) कृतियों पर टिकी है, जो मैरी और शिशु के शांत और प्रकाशमान चित्रण हैं, साथ ही वेटिकन पैलेस के विशाल भित्ति चित्रों (frescoes) और आने वाली कलाकारों की पीढ़ियों पर उनके गहरे प्रभाव में भी निहित है।

प्रारंभिक जीवन और कलात्मक नींव

राफेल का जन्मस्थान उर्बिनो, ड्यूक फेडरिको दा मोंटेफेल्ट्रो के शासनकाल के दौरान संस्कृति का एक जीवंत केंद्र था। ड्यूक ने एक ऐसा वातावरण तैयार किया था जहाँ कला फल-फूल सकती थी, जिसने पूरे इटली से विद्वानों, कवियों और कलाकारों को आकर्षित किया। राफेल के पिता, जियोवानी सान्ती, दरबार के एक चित्रकार थे, और उन्हीं के माध्यम से युवा राफेल का परिचय कला की दुनिया से हुआ। जियोवानी ने अपने पुत्र में न केवल तकनीकी कौशल विकसित किया, बल्कि शास्त्रीय साहित्य और दर्शन के प्रति गहरी समझ भी पैदा की – जो उभरते मानवतावादी आंदोलन के महत्वपूर्ण तत्व थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जियोवानी ने राफेल को ड्यूक के आसपास के कलात्मक हलकों से परिचित कराया, जिससे उन्हें लियोनार्डो दा विंची और अन्य प्रमुख दिग्गजों के विचारों को समझने का अवसर मिला। 1494 में अपने पिता की मृत्यु के बाद, राफेल ने अपनी कार्यशाला के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली, जो एक चुनौतीपूर्ण कार्य था जिसने उनके संगठनात्मक कौशल को निखारा और उनकी कलात्मक प्रतिभा को और विकसित किया। उन्होंने जल्द ही एक प्रतिभाशाली चित्रकार के रूप में पहचान बना ली और पूरे क्षेत्र के चर्चों और निजी संरक्षकों के लिए काम करना शुरू कर दिया। उनकी प्रारंभिक कृतियों, जैसे कि *द ट्रिब्यूट मनी* (लगभग 1503-1504), ने परिप्रेक्ष्य (perspective) और संरचना पर असाधारण नियंत्रण का प्रदर्शन किया, जो उन शैलीगत नवाचारों का संकेत था जो उनकी परिपक्व शैली को परिभाषित करने वाले थे। उन्होंने 1504 से 1507 तक पेरूजा में समय बिताया, जहाँ वे पिएत्रो वानुची (जिन्हें पेरुगिनो के नाम से जाना जाता है) के संरक्षण में रहे, और मास्टर की तकनीकों को सीखते हुए साथ ही अपना स्वयं का विशिष्ट दृष्टिकोण विकसित किया।

फ्लोरेंटाइन प्रभाव और मैडोना का उदय 1508 में, राफेल फ्लोरेंस चले गए, जो उस समय कलात्मक नवाचार से लबरेज शहर था। वे लियोनार्डो दा विंची, माइकल एंजेलो और मासाचियो के कार्यों से गहराई से प्रभावित हुए – वे कलाकार जो परिप्रेक्ष्य, शरीर रचना (anatomy) और भावनात्मक अभिव्यक्ति की सीमाओं को आगे बढ़ा रहे थे। उन्होंने फ्लोरेंस में लगभग तीन वर्ष बिताए, और पेंटिंग्स की एक ऐसी श्रृंखला बनाई जिसने पेरुगिनो की संयमित शैली से एक महत्वपूर्ण विचलन को चिह्नित किया। उदाहरण के लिए, *द एंटम्बमेंट* (1507-1508) ने नाटकीय संरचना पर राफेल की बढ़ती महारत और हाव-भाव व अभिव्यक्ति के माध्यम से गहन भावना व्यक्त करने की उनकी क्षमता को प्रदर्शित किया। इसी अवधि के दौरान उन्होंने अपनी सिग्नेचर "मैडोना" श्रृंखला को परिष्कृत करना शुरू किया – वर्जिन मैरी और शिशु ईसा मसीह के चित्रों की एक श्रृंखला – जो उनकी सबसे प्रशंसित उपलब्धि बनी। ये मैडोना केवल भक्तिपूर्ण चित्र नहीं थे; वे सावधानीपूर्वक निर्मित कथाएँ थीं, जो शास्त्रीय सुंदरता और दार्शनिक गहराई से ओत-प्रोत थीं।

वेटिकन के वर्ष: भव्य भित्ति चित्र

1509 में, राफेल ने पोप जूलियस द्वितीय से वेटिकन पैलेस के *स्टैंजा डेला सेग्नातुरा* (Stanza della Segnatura) को सजाने का कार्य स्वीकार किया। इस विशाल परियोजना ने राफेल को एक बड़े पैमाने पर अपनी कलात्मक प्रतिभा दिखाने का अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया। अगले कुछ वर्षों में, उन्होंने चार विशाल भित्ति चित्र बनाए जो दर्शन, धर्मशास्त्र और शास्त्रीय ज्ञान के विषयों की खोज करते थे – जो मानवतावादी विद्वत्ता में पोप की रुचि को दर्शाते थे। *द स्कूल ऑफ एथेंस* (1509-1511), संभवतः उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति, प्लेटो और अरस्तू सहित प्राचीन दार्शनिकों और वैज्ञानिकों के एक समूह को जीवंत बहस में संलग्न दिखाती है। यह भित्ति चित्र केवल एक ऐतिहासिक चित्रण नहीं है; यह मानवीय तर्क और बौद्धिक जांच का एक शक्तिशाली रूपक है, जो शास्त्रीय ज्ञान और ईसाई विश्वास के बीच सामंज्यतापूर्ण संश्लेषण के पुनर्जागरण आदर्श को साकार करता है। उन्होंने *द ट्रायंफ ऑफ जेमिनी* (1509-1510) और *द डिस्प्यूटेशन ऑफ कॉन्स्टेंटाइन* (1510-1511) को भी पूरा किया, जिससे संरचना, रंग और मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के मास्टर के रूप में उनकी प्रतिष्ठा और मजबूत हुई।

विरासत और स्थायी प्रभाव

6 अप्रैल, 1520 को रोम में केवल तैंतीस वर्ष की आयु में राफेल की असामयिक मृत्यु ने एक शानदार करियर को बीच में ही रोक दिया। अपने संक्षिप्त जीवन के बावजूद, वे कलाकृतियों का एक असाधारण भंडार छोड़ गए जिसने कलाकारों की पीढ़ियों को गहराई से प्रभावित किया। स्पष्टता, सामंजस्य और आदर्शित सुंदरता पर उनके जोर ने 'हाई पुनर्जागरण' शैली की पहचान बन गए, जिससे आने वाली सदियों तक यूरोप के कलात्मक मानकों को आकार मिला। उनका प्रभाव अनगिनत चित्रकारों के कार्यों में देखा जा सकता है, जिनमें वे भी शामिल हैं जो बारोक काल में उनके उत्तराधिकारी बने। राफेल की विरासत उनकी व्यक्तिगत पेंटिंग्स से कहीं आगे तक फैली हुई है; उन्हें कलात्मक पूर्णता के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है – "सौंदर्य के कवि" – जिनकी कला दुनिया भर के दर्शकों को प्रेरित और उन्नत करती रहती है। उनका कार्य मानवीय रचनात्मकता की शक्ति और शास्त्रीय आदर्शों के स्थायी आकर्षण का एक प्रमाण बना हुआ है।
साइमन बेनिंग

साइमन बेनिंग

1483 - 1561 , इटली

मुख्य तथ्य

  • Artistic Movement Or Style: उच्च पुनर्जागरण शास्त्रीयतावाद
  • Artists Or Movements Influenced By This Artist:
    • यूरोपीय शैक्षणिक परंपरा
    • नव-प्लेटोनिक आदर्श
  • Artists Who Influenced This Artist:
    • पेरुगिनो
    • लियोनार्डो दा विंची
    • माइकल एंजेलो
  • Date Of Birth: 6 अप्रैल, 1483
  • Date Of Death: 6 अप्रैल, 1520
  • Full Name: रफ़ाएलो सान्ज़ियो
  • Nationality: इतालवी
  • Notable Artworks:
    • सिस्टीन मैडोना
    • द स्कूल ऑफ एथेंस
    • मैरिज ऑफ द वर्जिन
  • Place Of Birth: उर्बिनो, इटली
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